Center For Workers Education

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भारत के मजदूर आंदोलन के समक्ष चुनौतियां

सुरेन्द्र प्रताप
बदलाव प्रक्रिति का नियम है। कोई भी चीज स्थिर नहीं रहती है और कोई भी चीज अपरिवर्तनीय नहीं रह सकती है। लेकिन बदलाव की प्रक्रिति और गति की दिशा निश्चित नहीं होती। समाज के संदर्भ में यह किसी भी काल खंड में किसी भी देश-राज्यि में परस्पंर विरोधी वर्गों के शक्ति संतुलन पर निर्भर करती है। किसी भी देश में यह शक्ति संतुलन स्थातनीय कारकों के अलावा उस कालखंड में दुनिया में वर्ग शक्तियों के संतुलन से भी पूरी तरह प्रभावित होता है। इतिहास के पीछे की दिशा में जाने की संभावना तो लगभग नहीं के बराबर ही होती है क्यों्कि पिछले समाज की पोषक शक्तियों का अंत करके ही नया समाज बनता है। समाज में पैदा हुई नयी विरोधी शक्तियां उसे अपनी-अपनी दिशा में ले जाने के लिए संघर्षरत होती हैं और यह किस तरफ जाएगा और किस गति से जाएगा और किसके हितों को प्रधानता देने वाला समाज बनेगा यह उस समय मौजूदा वर्ग शक्तियों के संतुलन से ही तय होता है।
पिछले दशकों में भी देश और दुनिया बदली है। यह 1947 से पहले की दुनिया और देश नहीं है और यह सत्ा् दशर या अस्सीि के दशक की दुनिया और देश भी नहीं रहा। मजदूर आंदोलन की मौजूदा चुनौतियों को समझने के लिये यह जानना जरूरी है कि देश और दुनिया की सामाजिक राजनीतिक आर्थिक व्यदवस्थाद में और वर्ग शक्तियों के संतुलन में आखिर क्या बुनियादी बदलाव हुए हैं और यह बदलाव कैसे हुए। सार रूप में कहा जाय तो विश्वत पूंजी ने अपने संकटों का समाधान करने के लिये एक नयी विश्वु व्यावस्था बनायी और उसने अपने संकटों के समाधान के लिये जो रणनीति अपनायी उसने मजदूर वर्ग को संकट में धकेल दिया।
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